auqaat
औक़ात आखिर क्या है?
अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं —
"तेरी औक़ात क्या है?"
ये एक ऐसा जुमला है जो ज़ुबान से निकलते ही किसी की इज़्ज़त को मिट्टी में मिला देता है।
लेकिन ज़रा ठहर कर सोचिए...
औक़ात असल में है क्या?
इंसान की औक़ात बस उतनी ही है,
जब तक उसकी सांसें चल रही हैं।
जब तक दिल धड़क रहा है, जब तक ज़ुबान बोल रही है,
जब तक हाथ-पैर हिल रहे हैं — तब तक इंसान कुछ है, कोई है।
पर जैसे ही मौत आती है,
वो जिस्म जो कल तक इतराता था,
आज बस मिट्टी का एक टुकड़ा रह जाता है।
लोग कहते हैं — “जनाज़ा उठा लो”, “मय्यत रखी है”।
अब कोई नाम नहीं, कोई रुतबा नहीं, कोई औक़ात नहीं।
फिर भी इंसान गुरूर करता है —
अपनी दौलत पर, अपने पद पर, अपनी ताक़त पर।
वो भूल जाता है कि ये सब कुछ बस उधार का वक्त है।
मौत न जाती किसी अमीर को देखकर,
न रुकती किसी बादशाह की दुआ पर।
जब आनी होती है, तो हर शान-शौकत धूल में मिल जाती है।
तो फिर सवाल यही है —
जब आख़िर में सब कुछ यहीं रह जाना है,
तो गुरूर किस बात का?
इंसान की सच्ची औक़ात उसकी इंसानियत है,
उसका अख़लाक़, उसका प्यार और सहारा जो वो दूसरों को देता है।
बाकी सब तो मिट्टी में मिल जाने वाला धोखा है।
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🌿 निष्कर्ष
औक़ात कभी दौलत से नहीं,
किरदार से मापी जाती है।
जिस दिन इंसान ये समझ जाएगा,
दुनिया से नफरत, घमंड और तक़ब्बुर मिट जाएगा।
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